Somnath_Jyotirlinga

Somnath, Jyotirlinga Temple of Lord Shiva, शिवजी के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का विवरण|

सोमनाथ  ज्योतिर्लिंग(Somnath Jyotirlinga)| श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग गुजरात राज्य में सौराष्ट्र क्षेत्र के वेरावल बंदरगाह में विराजमान है, यह एक अतयंत ही महत्वपुर्ण मन्दिर है। यहां स्थित ज्योतिर्लिंग की गिनती 12 ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम की जाती है। इस मंदिर के बारे में मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण स्वंय चन्द्रदेव ने किया था। इस तथ्य का उल्लेख ऋगवेद में भी मिलता है।

Somnath_Jyotirlinga

Somnath_Jyotirlinga

इस प्रसिद्ध मंदिर को अतीत में कई बार ध्वस्त एवं निर्मित किया गया है। सन् 1022 ई में इसकी समृद्धि को महमूद गजनवी के हमले से सार्वाधिक नुकसान पहुँचा था। यह मंदिर हिंदू धर्म के उत्थान-पतन के इतिहास का प्रतीक रहा है। वर्तमान भवन के पुनर्निर्माण का आरंभ भारत की स्वतंत्रता के पश्चात् लौहपुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल ने करवाया और 1 दिसंबर 1995 को भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने इसे राष्ट्र को समर्पित किया।

सोमनाथ मंदिर विश्व प्रसिद्ध धार्मिक व पर्यटन स्थल है। मन्दिर के प्रांगण में संध्या के समय प्रतिदिन ध्वनि और प्रकाश से सम्पादित एक घंटे का भव्य कार्यक्रम होता है, जिसमें सोमनाथ मंदिर के इतिहास का बड़ा ही सुंदर सचित्र वर्णन किया जाता है। लोककथाओं के अनुसार यहीं श्रीकृष्ण ने देहत्याग किया था। इस कारण इस क्षेत्र का और भी महत्व बढ़ गया।

प्राचीन कथा

प्राचीन हिंदु ग्रंथ के अनुसार दक्षप्रजापति नरेश की 27 कन्या थीं उन सभी का विवाह सोमदेव अर्थात चंद्रदेव से की गई। परंतु सोमदेव उन सभी कन्याओं में से रोहिणी नाम की पत्नि से सबसे अधिक प्रेम और सम्मान करते थे, इसी बात से क्रोध में आकर राजा दक्ष ने सोमदेव को श्राप दे दिया जिसके प्रभाव से सोमदेव की काँन्ति (रोशनी, चमक) दिनोदिन कम होने लगी। इस श्राप के कष्ट से मुक्ति हेतु वो शिव जी अराधना में लिन हो गए और अंतत: शिव जी प्रसन्न हुए और उन्हें वरदान दिया कि जिस प्रकार उनकी काँन्ति दिनोदिन कम हो रही है उसी प्रकार उनकी काँन्ति लुप्त होने के पश्चात् दिनोदिन बढेगी और यह क्रम सदैव चलता रहेगा और इस क्रम का आवर्तकाल पुरे 27 दिनों का होगा। सोमदेव के कष्ट से मिले मुक्ति के कारण उन्होंने शिव जी के एक मन्दिर का निर्माण किया और इसी मन्दिर को सोमनाथ मन्दिर के नाम से जाना जाने लगा।

इतिहास

सोमनाथ मन्दिर का इतिहास ईसा के पहले का माना जाता है और इस मंदिर की महिमा और कीर्ति दूर-दूर तक फैली थी। अरबी यात्री अलबरुनी ने यात्रा के वृतांत में इसका उल्लेख किया है। जिससे प्रभावित हो कर महमुद ग़ज़नवी ने सन् 1024 में अपने 5000 सेना के साथ हमला किया और उस मन्दिर की सम्पत्ति लुट कर, मन्दिर को तोड दिया और ऐसा माना जाता है कि हमले के वक्त मन्दिर में लगभग 50,000 श्रद्धालु पुजा और प्रार्थना में लीन थे जिन्हें मौत के घाट उतार दिया गया था। इससे पहले इस मन्दिर को सातवीं और आठवीं शताब्दी में हमला करके तोडा गया और इसे पुन: लोगों ने स्थापित किया।

मंदिर का बार-बार खंडन और जीर्णोद्धार होता रहा पर शिवलिंग यथावत रहा। लेकिन सन 1026 में महमूद गजनी ने जो शिवलिंग खंडित किया, वह यही आदि शिवलिंग था। इसके बाद प्रतिष्ठित किए गए शिवलिंग को 1600 में अलाउद्दीन की सेना ने खंडित किया। इसके बाद कई बार मंदिर और शिवलिंग को खंडित किया गया। बताया जाता है आगरा के किले में रखे देवद्वार सोमनाथ मंदिर के हैं। महमूद गजनी सन 1026 में लूटपाट के दौरान इन द्वारों को अपने साथ ले गया था।

1948 में प्रभासतीर्थ प्रभास पाटण के नाम से जाना जाता था। इसी नाम से इसकी तहसील और नगर पालिका थी। यह जूनागढ़ रियासत का मुख्य नगर था। लेकिन 1948 के बाद इसकी तहसील, नगर पालिका और तहसील कचहरी का वेरावल में विलय हो गया। सोमनाथ मंदिर के मूल मंदिर स्थल पर मंदिर ट्रस्ट द्वारा निर्मित नवीन मंदिर स्थापित है।

नवीन मन्दिर

राजा कुमार पाल द्वारा इसी स्थान पर अन्तिम मंदिर बनवाया गया था। सौराष्ट्र के मुख्यमन्त्री उच्छंगराय नवल शंकर ढेबर ने 19 अप्रैल 1950 को यहां उत्खनन कराया था। इसके बाद भारत सरकार के पुरातत्व विभाग ने उत्खनन द्वारा प्राप्त ब्रह्मशिला पर शिव का ज्योतिर्लिग स्थापित किया है। सौराष्ट्र के पूर्व राजा दिग्विजय सिंह ने 8 मई 1950 को मंदिर की आधार शिला रखी तथा 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ॰ राजेंद्र प्रसाद ने मंदिर में ज्योतिर्लिग स्थापित किया। नवीन सोमनाथ मंदिर 1962 में पूर्ण निर्मित हो गया। 1970 में जामनगर की राजमाता ने अपने स्वर्गीय पति की स्मृति में उनके नाम से दिग्विजय द्वार बनवाया। इस द्वार के पास राजमार्ग है और पूर्व गृहमन्त्री सरदार बल्लभ भाई पटेल की प्रतिमा है। सोमनाथ मंदिर निर्माण में पटेल का बडा योगदान रहा। मंदिर के दक्षिण में समुद्र के किनारे एक स्तंभ है। उसके ऊपर एक तीर रखकर संकेत किया गया है कि सोमनाथ मंदिर और दक्षिण ध्रुव के बीच में पृथ्वी का कोई भूभाग नहीं है।

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